यह कहानी किसी काल्पनिक कथा पर आधारित नहीं है, बल्कि यह प्रामाणिक और ऐतिहासिक हदीसों के साक्ष्यों पर आधारित एक ऐसा वृत्तांत है, जो इस्लाम के इतिहास की सबसे दर्दनाक और महत्वपूर्ण घटना 'वाकिया-ए-कर्बला' के वास्तविक सच और उसकी पृष्ठभूमि को उजागर करता है।
इस्लामी कैलेंडर की शुरुआत मुहर्रम के पवित्र महीने से होती है। यह उन चार महीनों में से एक है जिन्हें अल्लाह ने अत्यंत सम्मानित और पवित्र घोषित किया है। इस महीने में किसी भी प्रकार का युद्ध या खून-खराबा करना सख्त वर्जित (हराम) माना गया है। इतिहास गवाह है कि इसी महीने की दसवीं तारीख (आशूरा) को अल्लाह ने हज़रत मूसा (अ.स.) और उनकी कौम को फिरौन के अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी और फिरौन को उसकी सेना सहित दरिया में डुबो दिया था।
लेकिन, युद्ध के लिए पूरी तरह वर्जित होने के बावजूद, यह महीना पूरी इंसानियत के इतिहास में एक अत्यंत दर्दनाक और महान शहादत के लिए याद किया जाता है—इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत। कर्बला की यह घटना कोई अचानक भड़की हुई जंग नहीं थी, बल्कि यह दशकों से सुलग रहे एक गहरे राजनीतिक और वैचारिक संघर्ष का चरम बिंदु थी, जिसने अंततः उस पवित्र व्यवस्था को बदल दिया जिसे अल्लाह के रसूल (स.अ.व.) ने स्थापित किया था।
कर्बला के इस गहरे पस-मंज़र (पृष्ठभूमि) को समझने के लिए हमें उस दौर में जाना होगा जब इस्लाम की बुनियाद रखी जा रही थी। रसूलुल्लाह (स.अ.व.) और मौला अली (अ.स.) का रिश्ता केवल पारिवारिक नहीं था, बल्कि यह एक गहरा रूहानी और अटूट संबंध था।
जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने अपनी अंतिम हज यात्रा से लौटते हुए 'गदीर-ए-खुम' नामक स्थान पर पड़ाव डाला, तो उन्होंने हज़ारों सहाबा के सामने मौला अली का हाथ हवा में बुलंद किया और फरमाया: "जिसका मैं मौला (मित्र/संरक्षक) हूँ, उसका अली मौला है" [जामिया तिर्मिज़ी 3713, सहीह मुस्लिम 2408]। इसी तरह, जब गज़वा-ए-तबूक के मौके पर रसूलुल्लाह (स.अ.व.) मदीने से प्रस्थान कर रहे थे और उन्होंने अली (अ.स.) को मदीना की सुरक्षा के लिए पीछे रहने को कहा, तो अली (अ.स.) की आंखों में आंसू आ गए। तब नबी (स.अ.व.) ने उन्हें दिलासा देते हुए फरमाया: "क्या तुम इस बात पर खुश नहीं हो कि तुम्हारा मुझसे वही संबंध है जो हारून का मूसा से था? सिवाय इसके कि मेरे बाद कोई नबी नहीं होगा" [सहीह बुखारी 4416, सहीह मुस्लिम 6217]।
गज़वा-ए-खैबर के कठिन समय में भी, जब किला फतह नहीं हो रहा था, तो रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने घोषणा की थी: "कल मैं इस्लामी सेना का झंडा (अलम) उस शख्स को दूंगा जिससे अल्लाह और उसका रसूल मोहब्बत करते हैं और जो अल्लाह और उसके रसूल से मोहब्बत करता है।" अगले दिन वह झंडा मौला अली (अ.स.) को सौंपा गया और खैबर फतह हुआ [सहीह बुखारी 3701, सहीह मुस्लिम 6222]। अली (अ.स.) के प्रति नबी (स.अ.व.) का यह प्रेम और सम्मान इतना स्पष्ट था कि खुद रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने फरमाया था कि केवल एक सच्चा मोमिन ही अली से मोहब्बत रखेगा और केवल एक मुनाफिक (पाखंडी) ही उनसे नफरत या बुग्ज़ रखेगा [सहीह मुस्लिम 240]।
रसूलुल्लाह (स.अ.व.) अपनी उम्मत के भविष्य में आने वाले राजनीतिक बदलावों से भली-भांति वाकिफ थे। उन्होंने साफ तौर पर भविष्यवाणी की थी कि उनके बाद उम्मत का राजनीतिक ढांचा किस तरह बदलेगा। नबी (स.अ.व.) के आजाद किए गए गुलाम हज़रत सफीना (रजि.) बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने फरमाया था: "मेरी उम्मत में खिलाफत (खिलाफत-ए-राशदा) केवल 30 वर्षों तक रहेगी, और उसके बाद मलूकियत (काटने वाली बादशाहत) का दौर शुरू हो जाएगा" [मुसनद अहमद 18596, सुनन अबू दाऊद 4646, जामिया तिर्मिज़ी 2226]।
जब हज़रत सफीना से इन 30 वर्षों का हिसाब पूछा गया, तो उन्होंने गिनाया:
खिलाफत-ए-राशदा के सुनहरे दौर में हज़रत अबू बक्र के बाद जब हज़रत उमर फारूक (रजि.) खलीफा बने, तो उन्होंने इस्लामी साम्राज्य को बहुत मजबूती दी। लेकिन हज़रत उमर को पहले ही इल्हाम हो चुका था कि उनकी मौत के साथ ही उम्मत में आंतरिक फितनों (विद्रोहों) का दौर शुरू हो जाएगा। हज़रत हुज़ैफा बिन यमान (रजि.) ने बताया था कि हज़रत उमर स्वयं उस 'फितने के बंद दरवाज़े' की तरह थे, जिसके टूटने के बाद वह दरवाज़ा कयामत तक कभी बंद नहीं हो सकेगा [सहीह बुखारी 7096, सहीह मुस्लिम 7268]। हज़रत उमर को एक सपने के ज़रिए अपनी वफ़ात का संकेत मिल चुका था, जिसके बाद उन्होंने छह प्रमुख सहाबा की एक शूरा (समिति) बनाई ताकि अगला खलीफा चुना जा सके [सहीह बुखारी 3700, सहीह मुस्लिम 1258]।
इस शूरा के फैसले के तहत हज़रत उस्मान गनी (रजि.) तीसरे खलीफा चुने गए। हज़रत उस्मान के दौर के आखिरी वर्षों में राजनीतिक परिदृश्य बदलने लगा। उनके कुछ उमय्या गवर्नरों (जैसे कूफा के गवर्नर वलीद बिन उकबा, जो शराब के नशे में नमाज़ पढ़ाने के दोषी पाए गए थे और जिन्हें मौला अली ने स्वयं कोड़े मारने की सजा दी थी [सहीह बुखारी 3111, सहीह मुस्लिम 2964]) के गैर-अखलाकी और पक्षपातपूर्ण व्यवहार के कारण लोगों में असंतोष फैलने लगा।
एक अन्य गंभीर मामला अब्दुल्लाह बिन सा'द बिन अबी सरह का था, जिसे रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने मक्का फतह के दिन कत्ल करने का आदेश दिया था, लेकिन हज़रत उस्मान ने उसे अपने घर में पनाह दी और बाद में रसूलुल्लाह से उसके लिए माफी और बैअत की सिफारिश की, जिसे नबी (स.अ.व.) ने बेहद नापसंदगी के साथ स्वीकार किया था [सुनन नसाई]। बाद के वर्षों में इसी तरह के निर्णयों और उमय्या वंश के कुछ लोगों के रवैये के कारण मदीने में विद्रोह की स्थिति पैदा हो गई।
विद्रोहियों ने हज़रत उस्मान के घर को घेर लिया। यद्यपि मौला अली (अ.स.) ने पूरी कोशिश की कि बातचीत के ज़रिए मामला सुलझ जाए और उन्होंने अपने बेटों इमाम हसन और इमाम हुसैन को हज़रत उस्मान के घर की सुरक्षा में भी तैनात किया, लेकिन फितना इतना बढ़ चुका था कि विद्रोहियों ने हज़रत उस्मान (रजि.) के घर में घुसकर अत्यंत दर्दनाक तरीके से उन्हें शहीद कर दिया [सहीह बुखारी 7046]। यह वह समय था जब नबी (स.अ.व.) की वह भविष्यवाणी पूरी हुई जिसमें उन्होंने हज़रत उस्मान को एक बड़ी मुसीबत और परीक्षा के दौरान सब्र करने की वसीयत की थी [सहीह बुखारी, सहीह मुस्लिम]।
हज़रत उस्मान (रजि.) की शहादत के बाद उम्मत एक गहरे संकट में घिर गई। ऐसी गंभीर परिस्थितियों में सहाबा के भारी दबाव के बाद मौला अली (अ.स.) ने चौथे खलीफा के रूप में बागडोर संभाली ताकि शुद्ध इस्लामी निज़ाम और खिलाफत की रूह को बचाया जा सके।
लेकिन सीरिया (शाम) के उमय्या गवर्नर हज़रत मुआविया ने अली (अ.स.) की खिलाफत को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और हज़रत उस्मान के खून के बदले (किसास) की मांग को लेकर बगावत कर दी। इसी राजनीतिक रस्साकशी के बीच कुछ गलतफहमियों और साजिशकर्ताओं के कारण 'जंग-ए-जमल' जैसी दुखद घटना घटी, जिसमें उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा (रजि.) भी अनजाने में शामिल हो गईं। हालांकि, जब हज़रत आयशा का ऊंट 'हवाब' नामक स्थान पर पहुंचा और वहां के कुत्तों के भौंकने की आवाज सुनकर उन्हें रसूलुल्लाह की वह भविष्यवाणी याद आई, जिसमें उन्होंने अपनी पत्नियों को हवाब के कुत्तों के भौंकने से सावधान किया था, तो हज़रत आयशा तुरंत वापस लौटना चाहती थीं। लेकिन कुछ लोगों के मनाने पर वह शांति की उम्मीद में आगे बढ़ गईं, जो अंततः एक बड़ी मानवीय क्षति का कारण बनी [मुसनद अहमद, मजमा-उज़-ज़वाइद]। हज़रत आयशा को अपनी इस 'इतिहादी खता' (निर्णय की गलती) पर जीवन भर बेहद मलाल रहा [सहीह बुखारी]।
इसके तुरंत बाद हज़रत मुआविया की खुली बगावत के कारण 'जंग-ए-सिफ्फीन' का मैदान सजा। इस युद्ध में कौन सही था और कौन गलत, इसका सबसे बड़ा प्रमाण रसूलुल्लाह (स.अ.व.) की वह प्रसिद्ध हदीस थी जो उन्होंने मस्जिद-ए-नबवी के निर्माण के समय हज़रत अम्मार बिन यासिर (रजि.) के बारे में कही थी। नबी (स.अ.व.) ने अम्मार के सिर से मिट्टी झाड़ते हुए फरमाया था: "अफ़सोस! अम्मार को एक 'बागी गिरोह' (विद्रोही दल) शहीद करेगा। अम्मार उन्हें जन्नत की तरफ बुलाएगा और वे उसे जहन्नम की तरफ बुलाएंगे" [सहीह बुखारी 2812, सहीह मुस्लिम 7320]।
जंग-ए-सिफ्फीन में हज़रत अम्मार बिन यासिर मौला अली (अ.स.) की सेना की तरफ से लड़ते हुए हज़रत मुआविया की सेना के हाथों शहीद हो गए। जब हज़रत मुआविया के करीबी साथी अम्र बिन अल-आस को यह पता चला, तो वह बुरी तरह घबरा गए क्योंकि उन्होंने खुद रसूलुल्लाह से सुना था कि अम्मार का कातिल जहन्नम में जाएगा। जब उन्होंने यह बात मुआविया को बताई, तो मुआविया ने इस हकीकत को यह कहकर टालने की कोशिश की: "अम्मार को हमने नहीं मारा, बल्कि उसे तो अली ने मारा है जो उसे अपने साथ जंग के मैदान में लेकर आए।" जब मौला अली को मुआविया के इस तर्क का पता चला, तो उन्होंने बेहद तार्किक जवाब दिया: "अगर ऐसा है, तो क्या (नौज़ुबिल्लाह) रसूलुल्लाह ने हज़रत हमज़ा को शहीद किया था क्योंकि वह उन्हें उहुद की जंग में लेकर गए थे?" [मुसनद अहमद 16818]।
सिफ्फीन की जंग के बाद जब दोनों पक्षों में समझौते (तहकीम) की बात चल रही थी, तो मौला अली की सेना से एक कट्टरपंथी गुट अलग हो गया, जिसे 'ख्वारिज' (धर्म से बाहर निकलने वाले) कहा गया। रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने पहले ही भविष्यवाणी की थी कि उम्मत में फूट पड़ने के समय एक ऐसा गुट निकलेगा जो कुरान तो पढ़ेगा लेकिन वह उनके गले से नीचे नहीं उतरेगा, और उम्मत का वह गिरोह जो सत्य के सबसे करीब होगा, वह इनसे जंग करेगा [सहीह मुस्लिम 2459]।
इन ख्वारिज ने मौला अली और हज़रत मुआविया दोनों को काफिर घोषित कर दिया। तब मौला अली (अ.स.) ने अपने चचेरे भाई हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रजि.) को उनसे बातचीत करने के लिए भेजा। इब्ने अब्बास (रजि.) ख्वारिज के ठिकाने पर पहुंचे, जहां लगभग 6000 लोग जमा थे। उन्होंने ख्वारिज के मुख्य तीन ऐतराज़ों (आपत्तियों) का अपनी बुद्धिमत्ता और कुरान की रोशनी में ऐतिहासिक जवाब दिया:
इब्ने अब्बास के इन लाजवाब दलीलों को सुनकर 6000 में से 4000 ख्वारिज ने तौबा कर ली और वापस हक की तरफ लौट आए। बाकी बचे 2000 अड़ियल ख्वारिज ने जब जंग और फसाद शुरू किया, तो मौला अली ने उनसे 'जंग-ए-नहरवान' लड़ी और उनका खात्मा किया। हालांकि, मौला अली का दिल इतना बड़ा था कि उन्होंने कभी भी ख्वारिज को काफिर या मुनाफिक नहीं कहा, बल्कि उन्हें "अपने वे भाई जो बगावत की राह पर निकल गए थे" कहकर पुकारा [मुसन्निफ इब्ने-अबी-शैबा 39097]।
सन 40 हिजरी में मौला अली (अ.स.) की शहादत के बाद लोगों ने इमाम हसन (अ.स.) के हाथ पर बैअत की। इमाम हसन चाहते तो हज़रत मुआविया के खिलाफ एक बड़ा युद्ध लड़ सकते थे और उनके पास पहाड़ों जैसी विशाल सेनाएं भी मौजूद थीं। लेकिन रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने इमाम हसन के बचपन में ही उनके बारे में एक महान भविष्यवाणी की थी। नबी (स.अ.व.) ने मिम्बर पर अपने नवासे हसन को गोद में लेकर फरमाया था: "मेरा यह बेटा सरदार (नेता) है, और मुझे उम्मीद है कि अल्लाह इसके ज़रिए मुसलमानों के दो बहुत बड़े गिरोहों के बीच सुलह कराएगा" [सहीह बुखारी 2704]।
अपने नाना की इसी भविष्यवाणी को पूरा करने और मुसलमानों का खून बहने से बचाने के लिए इमाम हसन (अ.स.) ने सन 41 हिजरी में हज़रत मुआविया के साथ एक ऐतिहासिक शांति समझौता (सुलह) किया और खिलाफत उनके सुपुर्द कर दी। इस समझौते की मुख्य शर्तें थीं:
लेकिन अफ़सोस, इतिहास साक्षी है कि हज़रत मुआविया के शासनकाल में इन शर्तों का पालन नहीं किया गया। बल्कि बनू उमय्या के दौर में मस्जिदों के मिम्बरों से मौला अली (अ.स.) पर लानत भेजने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह अगले 60 वर्षों तक चलता रहा, जिसे बाद में केवल हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ (रहि.) ने कुरान की आयत (16:90) को खुतबे में शामिल करके बंद करवाया [तारीखुल खलीफा]।
इसी राजनीतिक और वैचारिक मतभेद के माहौल में, इमाम हसन (अ.स.) को धोखे से ज़हर देकर शहीद कर दिया गया। अपनी वफ़ात के समय इमाम हसन ने अपने भाई इमाम हुसैन को वसीयत की थी कि वह उनके कातिल का बदला लेने के लिए कोई खून-खराबा न करें और मामला अल्लाह पर छोड़ दें [मुसन्निफ इब्ने-अबी-शैबा 38514]। जब शाम के दरबार में हज़रत मुआविया को इमाम हसन की मौत की खबर मिली, तो मिकदाम बिन मा'दीकरब (रजि.) ने अत्यंत दुख व्यक्त करते हुए "इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन" पढ़ा। इस पर मुआविया ने उनसे पूछा कि क्या वह हसन की मौत को कोई बड़ी मुसीबत समझते हैं? तो मिकदाम ने करारा जवाब देते हुए कहा: "मैं इसे मुसीबत क्यों न समझूं, जबकि रसूलुल्लाह स्वयं हसन को अपनी गोद में बिठाते थे और फरमाते थे कि 'हसन मुझसे है और हुसैन अली से है'!" [सुनन अबू दाऊद 4131]।
हज़रत मुआविया के शासन के अंतिम दिनों में इस्लामी खिलाफत के इतिहास में एक ऐसा मोड़ आया जिसने इस्लामी जम्हूरियत (लोकतंत्र) की रूह को हमेशा के लिए कुचल दिया। हज़रत मुआविया ने अपने जीवन में ही अपने चरित्रहीन और अयोग्य बेटे यज़ीद को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया और लोगों से जबरन उसकी बैअत (निष्ठा की शपथ) लेने का अभियान शुरू किया।
जब मदीना के गवर्नर मर्वान बिन अल-हकम ने मस्जिद-ए-नबवी के मिम्बर से खड़े होकर यह दावा किया कि यज़ीद को नामज़द करना हज़रत अबू बक्र और हज़रत उमर की सुन्नत है, तो हज़रत अबू बक्र सिद्दीक के बेटे हज़रत अब्दुर रहमान बिन अबी बक्र (रजि.) खड़े हो गए और उन्होंने मर्वान को बीच में टोकते हुए दहाड़ कर कहा: "यह अबू बक्र और उमर की सुन्नत नहीं है! बल्कि यह कैसर (रोम के सम्राट) और किसरा (फारस के सम्राट) का शाही निज़ाम है, जहां बाप के बाद बेटा गद्दी पर बैठता है!" [सहीह बुखारी 4827]।
रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने बनू उमय्या के इस काले दौर और यज़ीद के शासन के बारे में बहुत पहले ही चेतावनी दे दी थी। हज़रत अबू हुरैरा (रजि.) बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने फरमाया था: "मेरी उम्मत की बर्बादी और हलाकत कुरैश के कुछ मूर्ख लड़कों के हाथों होगी" [सहीह बुखारी 7254, सहीह मुस्लिम 7325]। हज़रत अबू हुरैरा मदीने के बाज़ारों में चलते हुए अक्सर यह दुआ मांगा करते थे: "ऐ अल्लाह! मैं वर्ष 60 हिजरी की शुरुआत और इन नासमझ लड़कों की हुकूमत से तेरी पनाह मांगता हूँ।" इतिहास गवाह है कि वर्ष 60 हिजरी में ही हज़रत मुआविया की मौत हुई और यज़ीद तख्त पर बैठा।
इमाम हुसैन (अ.स.) के बारे में रसूलुल्लाह (स.अ.व.) का प्रेम जगजाहिर था। वह फरमाते थे: "हसन और हुसैन जन्नत के नौजवानों के सरदार हैं" [जामिया तिर्मिज़ी 3781]। एक और हदीस में नबी (स.अ.व.) ने फरमाया था: "हुसैन मुझसे है और मैं हुसैन से हूँ, अल्लाह उस शख्स से मोहब्बत करे जो हुसैन से मोहब्बत रखता है" [जामिया तिर्मिज़ी 3775]।
कर्बला में इमाम हुसैन की शहादत कोई अनजानी घटना नहीं थी। खुद मौला अली (अ.स.) जब सिफ्फीन की जंग के सफर के दौरान कर्बला (नैनावा) की ज़मीन से गुज़रे थे, तो वह वहां की मिट्टी देखकर फूट-फूट कर रोने लगे थे। उन्होंने पुकारा था: "ऐ अबू अब्दुल्लाह (हुसैन)! फुरात के किनारे सब्र करना, ऐ अबू अब्दुल्लाह सब्र करना!" उन्होंने अपने साथियों को बताया था कि एक बार हज़रत जिब्रील (अ.स.) ने रसूलुल्लाह (स.अ.व.) को खबर दी थी कि उनका छोटा नवासा हुसैन फुरात के किनारे शहीद किया जाएगा और जिब्रील ने रसूलुल्लाह को कर्बला की लाल मिट्टी भी लाकर दी थी [मुसनद अहमद 648, अल-मुस्तदरक 822]।
सन 61 हिजरी की 10 मुहर्रम को जब यज़ीद की ज़ालिम फौज ने इमाम हुसैन और उनके मुट्ठी भर वफादार साथियों को तीन दिनों तक भूखा-प्यासा रखकर कर्बला के मैदान में घेर लिया, तो वह रूह कँपा देने वाला वाकिया पेश आया। ठीक उसी दिन दोपहर के समय मदीना में मौजूद हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रजि.) ने एक डरावना और सच्चा ख्वाब देखा। उन्होंने देखा कि रसूलुल्लाह (स.अ.व.) धूल से अ अटे हुए, अत्यंत गमगीन हालत में खड़े हैं और उनके हाथ में खून से भरी हुई एक शीशी है। जब इब्ने अब्बास ने पूछा कि यह क्या है, तो नबी (स.अ.व.) ने बेहद भारी आवाज़ में फरमाया: "यह हुसैन और उसके साथियों का खून है, जिसे मैं सुबह से इकट्ठा कर रहा हूँ।" इब्ने अब्बास ने उस तारीख और समय को नोट कर लिया, और बाद में पता चला कि इमाम हुसैन को ठीक उसी दिन और उसी समय कर्बला के मैदान में शहीद किया गया था [मुसनद अहमद 2165]।
इमाम हुसैन (अ.स.) को शहीद करने के बाद यज़ीद के गवर्नर उबैदुल्लाह बिन ज़ियाद के सामने जब इमाम का सिर मुबारक एक थाल में रखकर लाया गया, तो वह दुष्ट अपनी छड़ी से इमाम के होंठों और दांतों को कुरेदने लगा। यह देखकर वहां मौजूद वयोवृद्ध सहाबी हज़रत अनस बिन मालिक (रजि.) रो पड़े और उन्होंने कहा: "ज़ालिम! अपनी छड़ी हटा, मैंने रसूलुल्लाह को इन होंठों पर चूमते हुए देखा है, और हुसैन का चेहरा रसूलुल्लाह से सबसे ज्यादा मिलता था" [सहीह बुखारी 3748, जामिया तिर्मिज़ी 3778]।
यज़ीद का अत्याचार केवल कर्बला तक सीमित नहीं रहा। उसने अपने छोटे से शासनकाल में इस्लामी इतिहास के सबसे बड़े जघन्य अपराध किए:
लेकिन अल्लाह का इंसाफ भी बहुत जल्द सामने आया। इमाम हुसैन के खून के मुख्य गुनहगार उबैदुल्लाह बिन ज़ियाद का अंत बेहद भयानक हुआ। मुख्तार अल-सकफी के विद्रोह के दौरान जब इब्ने ज़ियाद मारा गया और उसका सिर काटकर कूफा की मस्जिद में रखा गया, तो लोगों ने देखा कि एक बड़ा सांप आया और वह भीड़ को चीरता हुआ इब्ने ज़ियाद के सिर के पास पहुंचा। वह सांप इब्ने ज़ियाद के नथुने (नाक के सुराख) में घुसा, कुछ देर अंदर रहा और फिर उसके मुंह से बाहर निकल गया। यह प्रक्रिया बार-बार दोहराई गई, जिससे अल्लाह ने दुनिया को दिखा दिया कि अहले-बैत के दुश्मनों का हश्र कितना खौफनाक होता है [जामिया तिर्मिज़ी 3780]।
इमाम हुसैन (अ.स.) ने यज़ीद जैसे अत्याचारी शासक के सामने झुकने के बजाय अपना और अपने पूरे परिवार का बलिदान देना बेहतर समझा। उनका यह बलिदान किसी सत्ता को पाने के लिए नहीं था, बल्कि रसूलुल्लाह (स.अ.व.) के लाए हुए सच्चे दीन, खिलाफत की लोकतांत्रिक रूह और मानवीय मूल्यों को हमेशा-हमेशा के लिए जीवित रखने के लिए था। कर्बला की यह अमर गाथा आज भी हर दौर के यज़ीदों के खिलाफ और हक की आवाज़ बुलंद करने के लिए पूरी इंसानियत को हौसला देती है।
इसका मुख्य कारण यज़ीद का ज़बरदस्ती खलीफा बनना और इस्लामी उसूलों (सिद्धांतों) को कुचलना था, जिसे इमाम हुसैन (अ.स.) ने मानने से साफ इनकार कर दिया और सत्य के लिए शहादत चुनी।
आशूरा के दिन ही इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके 72 साथियों ने कर्बला के मैदान में इस्लाम की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी थी। इसी दिन मूसा (अ.स.) को फिरौन से आज़ादी भी मिली थी।
कर्बला हमें सिखाती है कि चाहे ज़ुल्म कितना भी बड़ा और ताक़तवर क्यों न हो, सच्चाई और हक़ के लिए हमेशा डटकर खड़े रहना चाहिए और कभी भी ज़ालिम के आगे नहीं झुकना चाहिए।