आनुवंशिकी का परिचय (Introduction to Genetics)
जीव विज्ञान (Biology) की वह अत्यंत महत्वपूर्ण और उन्नत शाखा जिसके अंतर्गत हम वंशागति (Heredity), आनुवंशिकता के नियमों, तथा सजीवों में पाई जाने वाली विविधता (Variation) के आणविक और सैद्धांतिक पहलुओं का विस्तृत अध्ययन करते हैं, इसे आनुवंशिकी (Genetics) कहते हैं ।
जनकों (Parents) से उनकी संतति (Offspring) में आनुवंशिक लक्षणों के संचारण और स्थानांतरण की इस सुव्यवस्थित प्रक्रिया को, इसे वंशागति (Inheritance) कहते हैं । वंशागति ही आनुवंशिकी का मुख्य आधार है।
दूसरी ओर, हम यह भी देखते हैं कि एक ही माता-पिता की संतानें कभी भी एक-दूसरे की बिल्कुल 'कार्बन कॉपी' (Carbon copy) नहीं होती हैं (समरूप जुड़वा बच्चों को छोड़कर)। जनकों और उनकी संततियों के बीच, या एक ही प्रजाति के विभिन्न जीवों के बीच शारीरिक, संरचनात्मक या आनुवंशिक स्तर पर जो असमानताएं और विभिन्नताएं पाई जाती हैं, इसे विविधता (Variation) कहते हैं ।
मानव सभ्यता को 8000-10000 वर्ष ईसा पूर्व ही यह ज्ञात हो चुका था कि विविधता का मुख्य कारण और रहस्य लैंगिक जनन (Sexual reproduction) की प्रक्रिया में छिपा हुआ है । हमारे पूर्वजों ने पादपों और जंतुओं की प्राकृतिक विविधताओं का बहुत ही बुद्धिमानी से लाभ उठाया। उन्होंने प्रकृति में उपस्थित लाभदायक लक्षणों वाले जीवों का कृत्रिम चयन (Artificial selection) किया और उन्हें पालतू बनाकर उनके बीच प्रजनन करवाया। पुरानी जंगली गायों के कृत्रिम चयन और उनको पालतू बनाकर विकसित की गई उच्च कोटि की भारतीय किस्म 'पंजाब की साहीवाल गायें' (Sahiwal cows of Punjab) इसी ज्ञान का एक उत्कृष्ट उदाहरण हैं । यद्यपि हमारे पूर्वजों को वंशागति और विविधता के परिणामों का ज्ञान था, परंतु उन्हें इन घटनाओं के वैज्ञानिक और आणविक आधार के विषय में बहुत कम जानकारी थी।
मेंडल के वंशागति के नियम (Mendel's Laws of Inheritance)
उन्नीसवीं सदी के मध्य के वर्षों में आनुवंशिकता को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने की दिशा में एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक क्रांति आई। ऑस्ट्रिया के एक पादरी, गणितज्ञ और वैज्ञानिक, ग्रेगर जॉन मेंडल (Gregor Johann Mendel) ने अपने प्रयोगों के माध्यम से आनुवंशिकी की ठोस नींव रखी। मेंडल के इन्ही ऐतिहासिक योगदानों के कारण उन्हें 'आनुवंशिकी का जनक' (Father of Genetics) माना जाता है, अतः आनुवंशिकी का जनक मेंडल को, इसे आनुवंशिकी का जनक कहते हैं ।
मेंडल ने अपने प्रयोगों के लिए गार्डेन मटर (Garden pea - Pisum sativum) का चयन किया और लगातार सात वर्षों (1856-1863) तक अत्यंत धैर्यपूर्वक संकरण (Hybridization) के जटिल प्रयोग किए । विज्ञान के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था जब सांख्यिकीय विश्लेषणों (Statistical analysis) और गणितीय तर्कशास्त्र (Mathematical logic) का जीव विज्ञान की समस्याओं के समाधान हेतु प्रयोग किया गया हो । मेंडल द्वारा किए गए प्रयोगों में नमूनों की विशाल संख्या (Large sampling size) ने उनके आँकड़ों को भारी विश्वसनीयता प्रदान की। इसके अतिरिक्त, उनके द्वारा परीक्षण किए गए पौधों की उत्तरोत्तर पीढ़ियों (Successive generations) पर किए गए सफल निष्कर्षों ने यह सिद्ध कर दिया कि मेंडल के वंशागति नियम केवल अपुष्ट विचार नहीं थे, बल्कि वे प्रकृति के व्यापक नियम थे ।
मेंडल द्वारा मटर के पौधे का चयन (Selection of Pea Plant by Mendel)
मेंडल ने अनेक तद्रूप-प्रजनन-सम (True-breeding) मटर के शुद्ध वंशक्रमों को लेकर कृत्रिम परागण के प्रयोग किए। वह वंशक्रम जो कई पीढ़ियों तक स्वपरागण के फलस्वरूप स्थायी रूप से एक ही विशेषक (Trait) प्रदर्शित करता है, इसे तद्रूप प्रजननी वंशक्रम (True-breeding line) कहते हैं । मेंडल ने मटर की 14 तद्रूप प्रजननी किस्मों को छाँटा, अर्थात् उन्होंने अध्ययन के लिए 7 जोड़े विपरीत लक्षणों का चयन किया ।
तालिका 1: मेंडल द्वारा अध्ययन किए गए मटर के पौधे के 7 विपर्यास विशेषक
| क्र.सं. | लक्षण (Character) | प्रभावी विशेषक (Dominant) | अप्रभावी विशेषक (Recessive) |
|---|---|---|---|
| 1 | तने की ऊँचाई (Stem height) | लंबा (Tall) | बौना (Dwarf) |
| 2 | फूल का रंग (Flower color) | बैंगनी (Violet) | सफेद (White) |
| 3 | फूल की स्थिति (Flower position) | अक्षीय (Axial) | अंत्य (Terminal) |
| 4 | फली का आकार (Pod shape) | फूला हुआ (Inflated) | सिकुड़ा हुआ (Constricted) |
| 5 | फली का रंग (Pod color) | हरा (Green) | पीला (Yellow) |
| 6 | बीज का आकार (Seed shape) | गोल (Round) | झुर्रीदार (Wrinkled) |
| 7 | बीज का रंग (Seed color) | पीला (Yellow) | हरा (Green) |
महत्वपूर्ण आनुवंशिक शब्दावली (Important Genetic Terminology)
आनुवंशिकी के जटिल नियमों को गहराई से समझने से पूर्व, कुछ विशिष्ट वैज्ञानिक शब्दों की स्पष्ट जानकारी होना अनिवार्य है:
एक जीन की वंशागति: एकसंकर क्रॉस (Monohybrid Cross)
मेंडल ने वंशागति के अध्ययन के लिए सबसे पहले मटर के शुद्ध लंबे (TT) तथा शुद्ध बौने (tt) पौधे के बीच संकरण (Cross) कराया। जब केवल एक ही लक्षण (जैसे तने की ऊँचाई) के वंशागति का अध्ययन करने के लिए जनकों के बीच क्रॉस कराया जाता है, तो इसे एकसंकर क्रॉस (Monohybrid cross) कहते हैं ।
इस प्रयोग के लिए मेंडल ने एक जनक के पुष्प से परागकोश (Anthers) को हटा दिया (विपुंसन / Emasculation) और दूसरे जनक के परागकणों को उसके वर्तिकाग्र (Stigma) पर स्थानांतरित कर दिया। इस संकरण से उत्पन्न बीजों को उगाकर उन्होंने जो प्रथम संकर पीढ़ी प्राप्त की, उसे प्रथम संतति पीढ़ी (First Filial Generation - F1 पीढ़ी) कहा जाता है ।
मेंडल ने आश्चर्यजनक रूप से देखा कि F1 पीढ़ी के सभी पौधे लंबे (Tt) थे, अर्थात् वे अपने लंबे जनक के बिल्कुल समान थे; कोई भी पौधा बौना या मझोले कद का नहीं था।
F2 पीढ़ी में परिणाम और भी चौंकाने वाले थे। जो बौनेपन का लक्षण F1 पीढ़ी में पूरी तरह से छिप गया था, वह F2 पीढ़ी में पुनः प्रकट हो गया! मेंडल ने पाया कि F2 पीढ़ी के कुल पौधों में से 75 प्रतिशत (3/4) पौधे लंबे थे और 25 प्रतिशत (1/4) पौधे बौने थे। लंबे और बौनेपन के लक्षण जनकों के समान ही शुद्ध थे और इनमें किसी भी प्रकार का सम्मिश्रण (Blending) नहीं था; अर्थात् पौधे या तो पूर्ण रूप से लंबे थे या पूर्ण रूप से बौने ।
- फीनोटिपिक अनुपात (Phenotypic Ratio): 3:1 (3 लंबे : 1 बौना) ।
- जीनोटिपिक अनुपात (Genotypic Ratio): 1:2:1 (1 TT : 2 Tt : 1 tt) ।
मेंडल ने इन आनुवंशिक अनुपातों को गणित के द्विपद व्यंजक (Binomial expression) \((ax+by)^2\) के रूप में स्पष्ट किया। यदि हम T और t युग्मकों की समान आवृत्ति 1/2 मान लें, तो इस पद का विस्तार इस प्रकार होगा:
यह गणितीय प्रमाण इस बात की पुष्टि करता है कि वंशागति यादृच्छिक (Random) प्रायिकता पर आधारित है।
परीक्षार्थ संकरण (Test Cross)
जब F1 पीढ़ी के किसी प्रभावी फीनोटाइप वाले जीव (जिसका जीनोटाइप अज्ञात हो) का संकरण उसके अप्रभावी जनक (Homozygous recessive parent - tt) के साथ कराया जाता है, तो इसे परीक्षार्थ संकरण (Test Cross) कहते हैं ।
स्थिति 1: यदि अज्ञात पौधा शुद्ध (TT) है, तो संकरण (TT × tt) से प्राप्त होने वाले 100% पौधे लंबे (Tt) होंगे।
स्थिति 2: यदि अज्ञात पौधा विषमयुग्मजी (Tt) है, तो संकरण (Tt × tt) से प्राप्त होने वाले 50% पौधे लंबे (Tt) और 50% पौधे बौने (tt) होंगे। अतः यहाँ अनुपात 1:1 प्राप्त होता है ।
यह संकरण आनुवंशिकी में अज्ञात जीनोटाइप का पता लगाने का सबसे प्रामाणिक तरीका है।
मेंडल की सफलता के कारण (Reasons for Mendel's Success)
मेंडल की सफलता का श्रेय निम्नलिखित कारणों को दिया जाता है:
मेंडल के आनुवंशिकता के नियम (Mendel's Laws based on Monohybrid Cross)
एकसंकर क्रॉस के अपने गहन प्रेक्षणों और पनेट वर्ग (Punnett square) के विश्लेषण के आधार पर मेंडल ने वंशागति के दो अति-महत्वपूर्ण नियम प्रतिपादित किए:
1. प्रभाविता का नियम (Law of Dominance)
प्रभाविता के नियम के अनुसार:
- (क) जीवों में लक्षणों का निर्धारण 'कारक' (Factors) नामक विविक्त (Discrete) इकाइयों द्वारा होता है।
- (ख) ये कारक हमेशा जोड़ों (Pairs) में होते हैं।
- (ग) यदि किसी कारक के जोड़े के दोनों सदस्य असमान (Heterozygous) हों, तो उनमें से एक कारक दूसरे कारक के प्रभाव को पूर्ण रूप से दबा देता है; अर्थात् एक 'प्रभावी' (Dominant) होता है और दूसरा 'अप्रभावी' (Recessive) होता है ।
मेंडल का यह नियम भली-भांति स्पष्ट करता है कि F1 पीढ़ी में केवल एक ही जनक लक्षण (प्रभावी) क्यों प्रकट होता है और F2 पीढ़ी में 3:1 का अनुपात क्यों प्राप्त होता है।
2. पृथक्करण का नियम / विसंयोजन का नियम (Law of Segregation)
इस नियम का मूल आधार यह है कि किसी जीव में एलील (Allele) हमेशा जोड़े में विद्यमान रहते हैं, लेकिन वे आपस में कभी भी घुलते-मिलते (Blend) नहीं हैं। युग्मक निर्माण (Gamete formation) के समय, अर्धसूत्री विभाजन के दौरान कारकों के जोड़े के दोनों एलील एक-दूसरे से विसंयोजित (Separate) हो जाते हैं, जिससे एक युग्मक को जोड़े में से केवल एक ही कारक प्राप्त होता है ।
चूँकि एक युग्मक में किसी एक लक्षण के लिए केवल एक ही शुद्ध एलील मौजूद होता है (या तो T या t), इसलिए इसे युग्मकों की शुद्धता का नियम (Law of Purity of Gametes) भी कहते हैं । यही वह नियम है जो यह सुनिश्चित करता है कि F1 पीढ़ी में छिपा हुआ अप्रभावी लक्षण (जैसे बौनापन) F2 पीढ़ी में बिना किसी सम्मिश्रण या विकृति के अपने शुद्ध रूप में पुनः प्रकट हो जाए। मेंडल के नियम का यह कोई अपवाद नहीं है, बल्कि यह एक सार्वभौमिक नियम (Universal law) है।
मेंडलीय नियमों के अपवाद तथा जीन अंतःक्रिया (Exceptions to Mendel's Laws and Gene Interaction)
प्रकृति में लक्षणों की वंशागति सदैव मेंडल के सरल नियमों का कठोरता से पालन नहीं करती। बीसवीं सदी में कई वैज्ञानिकों ने देखा कि अनेक जीव जातियों में जीन एक-दूसरे के साथ जटिल रूप से अंतःक्रिया (Gene Interaction) करते हैं। सहलग्नता (Linkage) भी मेंडल के नियमों का एक प्रमुख अपवाद है। ऐसे प्रक्रमों को मेंडलीय आनुवंशिकी के विस्तार या अपवाद के रूप में जाना जाता है।
1. अपूर्ण प्रभाविता (Incomplete Dominance)
जब F1 संतति का फीनोटाइप दोनों जनकों में से किसी से भी पूर्णतः नहीं मिलता, बल्कि दोनों के बीच का एक मध्यवर्ती (Intermediate) लक्षण प्रकट होता है, तो इसे अपूर्ण प्रभाविता कहते हैं ।
इसका सबसे उत्कृष्ट उदाहरण श्वान पुष्प (Snapdragon / Antirrhinum majus) है । जब लाल फूल (RR) और सफेद फूल (rr) का संकरण कराया गया, तो F1 पीढ़ी में सभी गुलाबी फूल (Rr) प्राप्त हुए ।
आणविक स्पष्टीकरण: विषमयुग्मजी (Rr) अवस्था में केवल एक ही 'R' एलील होने के कारण लाल वर्णक का उत्पादन आधा रह जाता है, जिससे फूल गुलाबी दिखाई देते हैं । इसमें फीनोटिपिक और जीनोटिपिक अनुपात (1:2:1) समान होते हैं ।
2. सहप्रभाविता (Co-dominance)
जब F1 पीढ़ी में दोनों जनकों के लक्षण एक साथ और समान रूप से पूर्णतः अभिव्यक्त होते हैं, तो इसे सहप्रभाविता कहते हैं । मानवों में ABO रुधिर वर्ग (ABO Blood Grouping) इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है ।
जीन 'I' के तीन एलील होते हैं: \(I^A, I^B, i\) । जब जीनोटाइप \(I^A I^B\) होता है, तो रुधिर वर्ग 'AB' हो जाता है।
तालिका 2: मानव जनसंख्या में रुधिर वर्गों का आनुवंशिक आधार
| जनक 1 एलील | जनक 2 एलील | जीनोटाइप | रुधिर वर्ग (फीनोटाइप) |
|---|---|---|---|
| \(I^A\) | \(I^A\) | \(I^A I^A\) | A |
| \(I^A\) | \(I^B\) | \(I^A I^B\) | AB |
| \(I^A\) | \(i\) | \(I^A i\) | A |
| \(I^B\) | \(I^B\) | \(I^B I^B\) | B |
| \(I^B\) | \(i\) | \(I^B i\) | B |
| \(i\) | \(i\) | \(ii\) | O |
3. बहुविकल्पता (Multiple Allelism)
एक ही जीन स्थल पर उपस्थित रहने वाले जीन के दो से अधिक विभिन्न रूप, जो एक ही लक्षण को नियंत्रित करते हैं, इसे बहुएलील (Multiple allele) कहते हैं । चूँकि मानव रुधिर वर्ग का नियंत्रण तीन एलीलों (\(I^A, I^B, i\)) द्वारा होता है, यह इसका आदर्श उदाहरण है। मनुष्यों में ABO रक्त समूह पूर्ण रूप से बहु अलील और सहप्रभाविता दोनों को दर्शाता है ।
- यदि किसी व्यक्ति का रुधिर वर्ग AB है, तो उसका जीनोटाइप \(I^A I^B\) होगा ।
- रुधिर वर्ग O में एलील \(ii\) होता है — इसमें कोई एंटीजेन नहीं → सार्वभौमिक रक्तदाता (Universal Donor) ।
- रुधिर वर्ग AB में एंटीबॉडी अनुपस्थित → सार्वभौमिक प्राप्तकर्ता (Universal Recipient) ।
- यदि एक बालक का रुधिर वर्ग 'O' (\(ii\)) है तथा पिता का रुधिर वर्ग 'B' है, तो पिता का जीनोटाइप अनिवार्य रूप से \(I^B i\) होगा ।
4. प्लीओट्रॉपी या बहुप्रभाविता (Pleiotropy)
जब कोई एकल जीन एक से अधिक फीनोटिपिक लक्षणों को प्रभावित या नियंत्रित करता है, तो इसे प्लीओट्रॉपी कहते हैं ।
उदाहरण: दात्र कोशिका अरक्तता (Sickle Cell Anemia) — यह उत्परिवर्तित जीन न केवल हीमोग्लोबिन की संरचना और RBC के आकार को बदलता है, बल्कि कई अंगों (प्लीहा, वृक्क) को नुकसान पहुँचाता है और ऑक्सीजन परिवहन बाधित करता है ।
मटर के बीजों में मंड (Starch) संश्लेषण का जीन भी प्लीओट्रॉपी का उदाहरण है — यह बीजों का आकार (BB = बड़े कण, bb = छोटे कण) और आकृति (गोल या झुर्रीदार) दोनों नियंत्रित करता है ।
5. बहुजीनी वंशागति (Polygenic Inheritance)
जब कोई लक्षण तीन या उससे अधिक जीनों (Multiple genes) द्वारा संयुक्त रूप से नियंत्रित होता है, और उस पर पर्यावरण का भी प्रभाव पड़ता है, तो इसे बहुजीनी वंशागति कहते हैं ।
उदाहरण: मनुष्यों में त्वचा का रंग (Skin color) तीन जीनों (A, B, C) द्वारा नियंत्रित होता है — जितने अधिक प्रभावी एलील, उतना ही गहरा रंग। इसी प्रकार बालों का रंग, आँखों का रंग, और नाक का आकार भी बहुजीनी लक्षण हैं ।
6. एपिस्टेसिस (Epistasis)
जब एक जीन का जोड़ा किसी दूसरे (गैर-एलीलिक / Non-allelic) जीन जोड़े के प्रभाव को पूरी तरह से दबा देता है, तो इस घटना को एपिस्टेसिस कहते हैं । जो जीन प्रभाव छिपाता है = एपिस्टेटिक जीन; जिसका प्रभाव छिपता है = हाइपोस्टेटिक जीन ।
एपिस्टेसिस के कारण मेंडल का सामान्य द्विसंकर फीनोटिपिक अनुपात (9:3:3:1) बदल जाता है — Dominant epistasis में 12:3:1, Dominant-Recessive epistasis में 13:3 ।
मानव रक्त समूह में 'बॉम्बे फीनोटाइप' (Bombay Phenotype) इसका श्रेष्ठ उदाहरण है — H-जीन का उत्परिवर्तित रूप (hh), A और B रक्त समूह के जीनों के प्रभाव को पूरी तरह दबा देता है ।
दो जीनों की वंशागति: द्विसंकर क्रॉस (Dihybrid Cross)
जब दो जोड़ी विपरीत विशेषकों का एक साथ अध्ययन करने के लिए जनकों के बीच संकरण कराया जाता है, तो इसे द्विसंकर क्रॉस कहते हैं ।
मेंडल ने पीले और गोल बीज (RRYY) तथा हरे और झुर्रीदार बीज (rryy) के बीच संकरण कराया।
- 9 गोल और पीले (Round Yellow)
- 3 गोल और हरे (Round Green)
- 3 झुर्रीदार और पीले (Wrinkled Yellow)
- 1 झुर्रीदार और हरा (Wrinkled Green)
- फीनोटिपिक अनुपात: 9:3:3:1
- परीक्षार्थ संकरण अनुपात: 1:1:1:1
स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment)
जब किसी संकर में लक्षणों के दो जोड़े एक साथ लिए जाते हैं, तो किसी एक जोड़े का लक्षण-विसंयोजन दूसरे जोड़े से पूरी तरह स्वतंत्र होता है। इसका कोशिकीय आधार अर्धसूत्री विभाजन की मेटाफेज I (Metaphase I) अवस्था है ।
वंशागति का क्रोमोसोम सिद्धांत (Chromosomal Theory of Inheritance)
मेंडल के कार्यों की 1900 में पुनः खोज तीन वैज्ञानिकों—ह्यूगो डी व्रीज, कार्ल कॉरेन्स, और एरिक वॉन शेरमाक—ने की । वर्ष 1902 में, वाल्टर सटन और थियोडोर बोवेरी ने वंशागति का क्रोमोसोम सिद्धांत प्रतिपादित किया ।
तालिका 3: जीन और क्रोमोसोम के व्यवहार में समानता
| लक्षण | जीन (Gene) | क्रोमोसोम (Chromosome) |
|---|---|---|
| उपस्थिति | जोड़ों (Pairs) में होते हैं। | समजात जोड़ों (Homologous pairs) में होते हैं। |
| विसंयोजन | युग्मक निर्माण के दौरान अलग होते हैं। | Meiosis I के दौरान अलग होते हैं। |
| अपव्यूहन | स्वतंत्र रूप से अपव्यूहित होते हैं। | स्वतंत्र रूप से अपव्यूहित होते हैं। |
Y-सहलग्न लक्षण / होलेन्ड्रिक जीन (Y-Linked / Holandric Genes)
जो जीन Y-गुणसूत्र पर स्थित होते हैं और केवल पिता से पुत्र में वंशागत होते हैं, उन्हें Y-सहलग्न या होलेन्ड्रिक जीन (Holandric genes) कहते हैं।
- Y-सहलग्न जीन केवल पुरुषों में होते हैं (XX महिलाओं में Y नहीं होता)।
- ये हमेशा पिता → पुत्र में जाते हैं (Criss-cross inheritance नहीं होती)।
- कानों पर बाल (Hypertrichosis) → Y-chromosome पर।
- वर्णांधता और हीमोफीलिया → X-chromosome पर (X-linked) — Y-linked नहीं।
सहलग्नता और पुनर्योजन (Linkage and Recombination)
थॉमस हंट मॉर्गन (Thomas Hunt Morgan) ने फल-मक्खी (Drosophila melanogaster) पर प्रयोग कर सहलग्नता को सिद्ध किया।
एक ही गुणसूत्र पर स्थित जीनों की एक साथ वंशागत होने की भौतिक प्रवृत्ति को सहलग्नता (Linkage) कहते हैं । यह स्वतंत्र अपव्यूहन का सबसे बड़ा अपवाद है ।
उदाहरण: मटर (2n=14) में n=7 → सहलग्नता समूह = 7 । मनुष्यों में 2n=46 → सहलग्नता समूह = 23 ।
सहलग्नता के प्रकार:
युग्मन और प्रतिकर्षण (Coupling and Repulsion):
अर्धसूत्री विभाजन-I की पैकीटीन (Pachytene) अवस्था के दौरान समजात गुणसूत्रों के नॉन-सिस्टर क्रोमैटिड्स के बीच DNA आदान-प्रदान को क्रॉसिंग-ओवर कहते हैं। इस दौरान काइज्मा (Chiasmata) बनता है। क्रॉसिंग-ओवर से ही पुनर्योजन (Recombination) होता है ।
क्रॉसिंग-ओवर के चार चरण (Four Stages of Crossing Over):
- क्रॉस A (White-Yellow जीन): बहुत पास-पास → पुनर्योजन केवल 1.3% ।
- क्रॉस B (White-Miniature wings): दूर-दूर → पुनर्योजन 37.2% ।
न्यूरोस्पोरा (Neurospora crassa): इसमें एक द्विगुणित युग्मनज (Zygote) पहले अर्धसूत्री विभाजन से 4 अगुणित केंद्रक बनाता है, फिर ये समसूत्री विभाजन करते हैं → कुल 8 एस्कोस्पोर बनते हैं ।
लिंग निर्धारण (Sex Determination)
हेंकिंग (Henking) ने 1891 में 'X-काय' (X-body) की खोज की। लिंग निर्धारण की प्रमुख विधियाँ:
उत्परिवर्तन (Mutation)
डीएनए अनुक्रम में होने वाले अचानक, स्थायी और वंशागत परिवर्तन को उत्परिवर्तन कहते हैं ।
उत्परिवर्तन को दो मुख्य स्तरों पर समझा जा सकता है:
- बिंदु उत्परिवर्तन (Point Mutation): जब डीएनए के अनुक्रम में केवल एक एकल क्षारक युग्म (Single Base Pair) में परिवर्तन या प्रतिस्थापन होता है, तो इसे बिंदु उत्परिवर्तन कहते हैं । दात्र कोशिका अरक्तता (Sickle cell anemia) इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।
- फ्रेम-शिफ्ट उत्परिवर्तन (Frameshift Mutation): जब डीएनए में एक या अधिक क्षारक (Bases) अवांछित रूप से जुड़ जाते हैं या हट जाते हैं, जिससे डीएनए को पढ़ने का पूरा क्रम (Reading frame) ही बदल जाता है, तो इसे फ्रेम-शिफ्ट उत्परिवर्तन कहते हैं ।
जो रासायनिक (Chemical) और भौतिक (Physical) कारक जीवों के डीएनए में उत्परिवर्तन उत्पन्न करने की क्षमता रखते हैं, उन्हें उत्परिवर्तजन (Mutagens) कहते हैं । पराबैंगनी विकिरण (UV Rays), एक्स-रे (X-rays), और मस्टर्ड गैस इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
आनुवंशिक विकार (Genetic Disorders)
चूँकि मानवों में मटर के पौधों की तरह कृत्रिम संकरण प्रयोग संभव नहीं हैं, इसलिए मानव आनुवंशिकीविद् एक विशेष विधि का उपयोग करते हैं। किसी परिवार के वंश वृक्ष (Family tree) में कई पीढ़ियों तक किसी विशेष लक्षण, बीमारी या अपसामान्यता के वंशबद्ध स्थानांतरण का आरेखीय विश्लेषण करना, इसे वंशावली विश्लेषण (Pedigree Analysis) कहते हैं ।
मानव वंशावली विश्लेषण में कुछ विशिष्ट मानक प्रतीकों का प्रयोग किया जाता है:
- वर्ग (Square): नर (Male) के लिए।
- वृत्त (Circle): मादा (Female) के लिए।
- समचतुर्भुज (Diamond): लिंग का उल्लेख नहीं (Unspecified sex)।
- ठोस या रंगे हुए प्रतीक (Shaded symbols): रोग से प्रभावित व्यक्ति (Affected individual)।
- एकल क्षैतिज रेखा (Single line): नर और मादा के बीच मैथुन (Mating)।
- दोहरी क्षैतिज रेखा (Double line): रिश्तेदारों के बीच सम-रक्त मैथुन (Consanguineous mating) ।
1. मेंडलीय विकार (Mendelian Disorders)
ये विकार डीएनए के किसी एकल जीन (Single gene) में हुए उत्परिवर्तन के कारण उत्पन्न होते हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी मेंडल के वंशागति नियमों का पालन करते हुए वंशागत होते हैं । सिस्टिक फाइब्रोसिस, हीमोफीलिया, थैलासीमिया — ये मेंडलीय आनुवंशिक बीमारियाँ हैं ।
सामान्य दृष्टि वाली माँ (वाहक: \(X^{c}X\)) × सामान्य पिता (\(X^{C}Y\))
संतानें: 50% पुत्र वर्णांध, सभी पुत्रियाँ फीनोटाइपिक रूप से सामान्य ।
आणविक कारण: β-globin श्रृंखला की 6th position पर बिंदु उत्परिवर्तन —
- DNA: CTC → CAC
- mRNA: GAG → GUG
- प्रोटीन: Glutamic acid → Valine
2. क्रोमोसोमीय विकार (Chromosomal Disorders)
ये विकार गुणसूत्रों की संख्या में कमी या अधिकता (Aneuploidy) के कारण उत्पन्न होते हैं। अर्धसूत्री विभाजन में गुणसूत्रों का सही ढंग से विसंयोजन न होना = Primary Non-disjunction ।
मनुष्यों में XXY व्यक्ति बनने की प्रक्रिया:
- माँ की ओर से: अर्धसूत्री विभाजन के दौरान माँ के दोनों X-गुणसूत्र अलग नहीं होते (Non-disjunction) → एक अंडाणु में दोनों X (XX अंडाणु) चले जाते हैं।
- यह XX अंडाणु जब पिता के Y-शुक्राणु से निषेचित होता है → XXY (क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम) बनता है।
- पिता की ओर से भी: पिता में X और Y Non-disjunction → XY-शुक्राणु + सामान्य X-अंडाणु → XXY।
Aneuploidy की प्रमुख शब्दावली:
लक्षण: मंद बुद्धि, छोटा-गोल सिर, मुँह आंशिक रूप से खुला, बड़ी जीभ, चौड़ी हथेली में विशिष्ट Palm crease ।
तालिका 4: मानव में क्रोमोसोमीय विकारों का सारांश
| सिंड्रोम | विन्यास | कुल गुणसूत्र | मुख्य कारण |
|---|---|---|---|
| डाउन सिंड्रोम | 45A + XX/XY | 47 | 21st Trisomy |
| क्लाइनफेल्टर | 44A + XXY | 47 | Extra X |
| टर्नर | 44A + XO | 45 | Monosomy X |
अतिरिक्त महत्वपूर्ण PYQ विषय (Extra Important PYQ Topics)
लिंग गुणसूत्र और अलिंग गुणसूत्र (Sex Chromosomes & Autosomes)
रुधिर वर्ग संकरण का उदाहरण (Blood Group Cross Example)
माँ का जीनोटाइप: \(I^A I^B\) | पिता का जीनोटाइप: \(ii\)
संभावित संतानें:
- \(I^A i\) → रुधिर वर्ग A
- \(I^B i\) → रुधिर वर्ग B
अतः संतति में 50% रुधिर वर्ग A और 50% रुधिर वर्ग B होंगे। O और AB वर्ग की संभावना नहीं।
आनुवंशिक और गैर-आनुवंशिक रोग (Hereditary vs Non-Hereditary Diseases)
- सिस्टिक फाइब्रोसिस (Cystic Fibrosis): ✅ आनुवंशिक (Autosomal recessive) — CFTR जीन में उत्परिवर्तन।
- हीमोफीलिया (Haemophilia): ✅ आनुवंशिक (X-linked recessive)।
- थैलासीमिया (Thalassaemia): ✅ आनुवंशिक (Autosomal recessive) — globin जीन में उत्परिवर्तन।
- क्रेटीनिज्म (Cretinism): ❌ आनुवंशिक रोग नहीं है — यह थायरॉइड ग्रंथि में थायरॉक्सिन हार्मोन की कमी के कारण होता है (Hypothyroidism / आयोडीन की कमी से)। यह वंशागत नहीं होता।
वंशागत रोगों की प्रकृति (Nature of Hereditary Diseases — Summary)
| रोग | प्रकार | गुणसूत्र | विशेषता |
|---|---|---|---|
| हीमोफीलिया | X-linked recessive | X | रक्त स्कंदन नहीं |
| वर्णांधता | X-linked recessive | X | लाल-हरे रंग में अंतर नहीं |
| दात्र कोशिका अरक्तता | Autosomal recessive | 11 | β-globin उत्परिवर्तन |
| थैलासीमिया | Autosomal recessive | 11/16 | Hemoglobin संश्लेषण कमी |
| फीनाइल कीटोन्यूरिया | Autosomal recessive | 12 | Phenylalanine चयापचय त्रुटि |
| हाइपरट्राइकोसिस | Y-linked (Holandric) | Y | कान पर बाल — पिता→पुत्र |
| क्रेटीनिज्म | ❌ गैर-आनुवंशिक | — | थायरॉक्सिन कमी |
निष्कर्ष
कोशिका के केंद्रक में छिपे ये धागेनुमा गुणसूत्र और उनके ऊपर बैठे अत्यंत सूक्ष्म जीन ही हमारे संपूर्ण अस्तित्व, स्वरूप, और हमारे रोगों की कुंजियां हैं। यही कारण है कि आनुवंशिकी का अध्ययन जीव विज्ञान की सबसे महत्वपूर्ण और सबसे रोमांचक यात्रा है।