अध्याय 8.2: प्रतिरक्षा (Immunity) - परीक्षा उपयोगी नोट्स

प्रतिरक्षा क्या है?

हमारे शरीर की वह क्षमता जिससे वह बाहरी रोगाणुओं (बीमारी फैलाने वाले जीवों) से लड़कर अपनी रक्षा करता है, उसे प्रतिरक्षा कहते हैं।

प्रतिरक्षा मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है:

1. सहज प्रतिरक्षा (Innate Immunity) [BSEB 2019, 2021]

यह एक प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली है जो हर इंसान में जन्म से ही मौजूद होती है। यह रोगाणुओं को शरीर में घुसने से रोकने के लिए चार प्रकार की रुकावटें (Barriers) बनाती है:

शारीरिक रोध (Physical Barrier): हमारी त्वचा कीटाणुओं को शरीर के अंदर जाने से रोकती है। इसके अलावा, श्वसन और पाचन नली के अंदर मौजूद श्लेष्मा (Mucus) की परत अंदर घुसने वाले रोगाणुओं को फँसा लेती है।

कायिकीय रोध (Physiological Barrier): पेट में बनने वाला अम्ल, मुँह की लार और आँखों के आँसू रोगाणुओं को नष्ट करते हैं। लार और आँसू में लाइसोजाइम नामक एंजाइम होता है जो कीटाणुओं को मारता है।

कोशिकीय रोध (Cellular Barrier) [BSEB 2024, 2026]: हमारे खून में मौजूद खास सफेद रक्त कोशिकाएं (जैसे- न्यूट्रोफिल्स, मोनोसाइट्स) और ऊतकों में पाए जाने वाले मैक्रोफेज रोगाणुओं को खाकर पूरी तरह नष्ट कर देते हैं।

साइटोकाइन रोध (Cytokine Barrier) [BSEB 2022, 2026]: जब किसी कोशिका पर वायरस का हमला होता है, तो वह खुद को बचाने के लिए 'इंटरफेरॉन' नामक एक प्रोटीन निकालती है। यह प्रोटीन आस-पास की स्वस्थ कोशिकाओं को वायरस के संक्रमण से बचाता है।

2. उपार्जित प्रतिरक्षा (Acquired Immunity)

यह वह प्रतिरक्षा है जो इंसान जन्म के बाद जीवन भर विभिन्न बीमारियों के संपर्क में आने से विकसित करता है। इसका सबसे मुख्य गुण इसकी 'स्मृति' (Memory) है।

प्राथमिक और द्वितीयक अनुक्रिया [BSEB 2023]: जब शरीर पहली बार किसी बीमारी के रोगाणु से लड़ता है, तो यह लड़ाई धीमी होती है (प्राथमिक अनुक्रिया)। लेकिन जब वही रोगाणु दोबारा हमला करता है, तो शरीर बहुत तेजी से और ताकतवर हमला करता है (द्वितीयक अनुक्रिया)। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को पहले हमले की याद रहती है।

लसीकाणु [BSEB 2015, 2019, 2021, 2023]: उपार्जित प्रतिरक्षा हमारे खून में मौजूद दो विशेष कोशिकाओं द्वारा काम करती है। इन्हें बी-लसीकाणु (B-lymphocytes) और टी-लसीकाणु (T-lymphocytes) कहते हैं।

प्रतिरक्षी (Antibody) [BSEB 2010, 2020, 2021, 2023]

बी-कोशिकाएं बाहरी रोगाणुओं से लड़ने के लिए खून में खास प्रोटीनों की एक सेना बनाती हैं, जिन्हें प्रतिरक्षी (Antibody) कहते हैं। टी-कोशिकाएं खुद प्रतिरक्षी नहीं बनातीं, लेकिन वे इन्हें बनाने में बी-कोशिकाओं की मदद करती हैं।

संरचना [BSEB 2018, 2021]: प्रतिरक्षी का आकार अंग्रेजी के 'Y' अक्षर जैसा होता है। इसमें 2 छोटी (Light) और 2 बड़ी (Heavy) पेप्टाइड श्रृंखलाएँ होती हैं। ये सभी श्रृंखलाएँ आपस में डाईसल्फाइड बंध से जुड़ी होती हैं। इसलिए इसका सूत्र H2L2 होता है।

प्रतिरक्षी अणु की संरचना

प्रकार [BSEB 2016]: मानव शरीर में मुख्य रूप से 5 प्रकार के प्रतिरक्षी बनते हैं: IgA, IgM, IgE, IgG, और IgD।

उपार्जित प्रतिरक्षा के प्रकार

तरल प्रतिरक्षा (Humoral Immunity) [BSEB 2026]: यह बी-कोशिकाओं द्वारा काम करती है। इसमें एंटीबॉडी सीधे रक्त (ह्यूमर) में मौजूद होती हैं।

कोशिका-माध्यित प्रतिरक्षा (Cell-Mediated Immunity) [BSEB 2024]: यह प्रतिरक्षा प्रणाली सीधे टी-कोशिकाओं द्वारा संचालित होती है।

अंग प्रतिरोपण (Organ Transplantation) और प्रतिरक्षा

हमारा प्रतिरक्षा तंत्र 'अपने' शरीर के अंगों और 'बाहरी' अंगों के बीच आसानी से फर्क कर सकता है।

निरोप अस्वीकृति (Graft Rejection): जब किसी मरीज को दूसरे इंसान का अंग (जैसे- किडनी या यकृत) लगाया जाता है, तो शरीर उसे बाहरी मानकर खारिज (Reject) कर सकता है। इसके लिए शरीर की कोशिका-माध्यित प्रतिरक्षा (CMI) पूरी तरह से जिम्मेदार होती है।

प्रतिरक्षा-निरोधक (Immunosuppressants) [BSEB 2026]: नए अंग को शरीर में सुरक्षित रखने के लिए मरीज को जीवन भर कुछ खास दवाइयां खानी पड़ती हैं जो प्रतिरक्षा तंत्र को शांत रखती हैं। इसका एक मुख्य उदाहरण साइक्लोस्पोरिन-ए है।

अध्याय 8.2.3: सक्रिय और निष्क्रिय प्रतिरक्षा (Active and Passive Immunity)

1. सक्रिय प्रतिरक्षा (Active Immunity)

परिभाषा: जब हमारा शरीर किसी बाहरी रोगाणु के संपर्क में आता है और हमारा प्रतिरक्षा तंत्र खुद अपने अंदर उससे लड़ने के लिए एंटीबॉडी (Antibody) बनाता है, तो इसे सक्रिय प्रतिरक्षा कहते हैं।

गति और प्रभाव: यह प्रक्रिया काफी धीमी होती है और इसका असर दिखने में थोड़ा लंबा समय लगता है। लेकिन, इसका प्रभाव शरीर में लंबे समय तक (दीर्घकालिक) रहता है क्योंकि शरीर रोगाणु की 'स्मृति' (Memory) सुरक्षित कर लेता है।

दुष्प्रभाव: इस प्रतिरक्षा में आमतौर पर शरीर पर कोई गंभीर दुष्प्रभाव (Side effects) नहीं होते हैं।

उदाहरण: किसी प्राकृतिक बीमारी से बीमार होकर ठीक होना या बीमारियों से बचने के लिए टीकाकरण (Vaccination) करवाना।

2. निष्क्रिय प्रतिरक्षा (Passive Immunity)

परिभाषा: जब शरीर को तुरंत सुरक्षा की जरूरत होती है और किसी बाहरी स्रोत से बने-बनाए (Readymade) एंटीबॉडी सीधे शरीर के अंदर डाल दिए जाते हैं, तो इसे निष्क्रिय प्रतिरक्षा कहते हैं।

गति और प्रभाव: यह प्रक्रिया बहुत तेज़ होती है और मरीज को तुरंत सुरक्षा प्रदान करती है। लेकिन, इसका प्रभाव कुछ ही समय (अल्पकालिक) के लिए होता है और शरीर में कोई 'स्मृति' नहीं बनती है।

दुष्प्रभाव: क्योंकि इसमें एंटीबॉडी बाहर से आते हैं, इसलिए कभी-कभी शरीर इसके खिलाफ कोई विपरीत प्रतिक्रिया (Reaction) कर सकता है।

उदाहरण: साँप के काटने पर तुरंत दिया जाने वाला एंटीवेनम (Antivenom) इंजेक्शन।

माँ से शिशु को मिलने वाली प्रतिरक्षा (निष्क्रिय प्रतिरक्षा के प्राकृतिक उदाहरण)

पीयूष या कोलोस्ट्रम (Colostrum) [BSEB 2024]: बच्चे के जन्म के बाद शुरुआती दिनों में माँ के स्तनों से एक गाढ़ा पीला दूध निकलता है, जिसे 'पीयूष' या कोलोस्ट्रम कहते हैं। इस दूध में IgA नाम का एंटीबॉडी बहुत अधिक मात्रा में होता है। यह नवजात शिशु के अपरिपक्व पाचन तंत्र (Gastrointestinal tract) को मजबूत करता है और उसे जानलेवा रोगाणुओं से बचाता है।

अपरा (Placenta) द्वारा: गर्भावस्था के दौरान पेट में पल रहे भ्रूण को भी अपरा (Placenta) के जरिए माँ के शरीर से कुछ एंटीबॉडी (जैसे- IgG) मिलते रहते हैं।

नोट: माँ के दूध और अपरा से मिलने वाले ये दोनों ही एंटीबॉडी, प्राकृतिक रूप से मिलने वाली निष्क्रिय प्रतिरक्षा (Passive Immunity) के सबसे अच्छे उदाहरण हैं।

अध्याय 8.2.4: टीकाकरण और प्रतिरक्षीकरण (Vaccination and Immunisation) [BSEB 2009, 2012]

सिद्धांत: टीकाकरण पूरी तरह से हमारे प्रतिरक्षा तंत्र की 'स्मृति' (Memory) के गुण पर काम करता है।

प्रक्रिया: टीके (Vaccine) में किसी बीमारी के कमज़ोर या निष्क्रिय रोगाणुओं (या उनके प्रोटीन) को हमारे शरीर में डाला जाता है।

कार्य: इसके जवाब में शरीर एंटीबॉडी बनाता है और 'स्मृति बी' (Memory B) और 'टी-कोशिकाएं' (T-cells) तैयार कर लेता है। भविष्य में जब असली रोगाणु हमला करता है, तो ये कोशिकाएं उसे तुरंत पहचान कर नष्ट कर देती हैं।

निष्क्रिय प्रतिरक्षीकरण (Passive Immunization): टिटेनस या साँप काटने (Snakebite) जैसी जानलेवा स्थितियों में, जहाँ तुरंत सुरक्षा चाहिए, मरीज को सीधे बने-बनाए एंटीबॉडी (Antitoxin) का इंजेक्शन दिया जाता है।

आधुनिक तकनीक: आजकल 'पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिकी' (Recombinant DNA Technology) का उपयोग करके जीवाणु या खमीर (Yeast) से सुरक्षित टीके बनाए जा रहे हैं। उदाहरण के लिए, हेपेटाइटिस बी (Hepatitis B) का टीका खमीर से भारी मात्रा में बनाया जाता है।

अध्याय 8.2.5: ऐलर्जी (Allergy) [BSEB 2010, 2018, 2019, 2021]

परिभाषा: पर्यावरण में मौजूद कुछ खास धूल-कणों या पदार्थों के प्रति हमारे प्रतिरक्षा तंत्र की बहुत अधिक और असामान्य प्रतिक्रिया को ऐलर्जी कहते हैं।

ऐलर्जन (Allergens): जो पदार्थ ऐलर्जी पैदा करते हैं, उन्हें ऐलर्जन कहते हैं। उदाहरण: धूल के कण (Mites), परागकण (Pollen), और जानवरों की रूसी (Animal dander)।

प्रतिरक्षी (Antibody) [BSEB 2010]: ऐलर्जी के दौरान हमारा शरीर भारी मात्रा में IgE प्रकार की एंटीबॉडी बनाता है।

कारण (रसायन) [BSEB 2010, 2021]: ऐलर्जी मुख्य रूप से शरीर की मास्ट कोशिकाओं (Mast cells) से निकलने वाले हिस्टैमिन (Histamine) और सीरोटोनिन (Serotonin) रसायनों के कारण होती है।

लक्षण: लगातार छींक आना, आँखों से पानी गिरना, नाक बहना और साँस लेने में तकलीफ होना (जैसे दमा/Asthma)।

इलाज: इसके लक्षणों को तुरंत कम करने के लिए प्रतिहिस्टैमिन (Antihistamines), एड्रीनेलिन (Adrenaline) और स्टेरॉइड जैसी दवाइयों का उपयोग किया जाता है।

अध्याय 8.2.6: स्व-प्रतिरक्षा (Autoimmunity)

परिभाषा: कभी-कभी आनुवंशिक या किसी अज्ञात कारण से, हमारा प्रतिरक्षा तंत्र शरीर की अपनी ही (Self) कोशिकाओं को बाहरी (Non-self) दुश्मन मानकर उन पर हमला कर देता है। इस स्थिति को स्व-प्रतिरक्षा (Autoimmunity) कहते हैं।

कारण: इसमें प्रतिरक्षा तंत्र 'अपने' और 'पराये' की पहचान करने की क्षमता खो देता है, जिससे शरीर के अंगों को भारी नुकसान होता है।

उदाहरण [BSEB 2018]: आमवाती संधिशोथ (Rheumatoid arthritis) इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जिसमें शरीर अपने ही जोड़ों (Joints) पर हमला कर देता है जिससे जोड़ों में भयंकर दर्द होता है।

अध्याय 8.2.7: शरीर में प्रतिरक्षा तंत्र (Immune System in the Body)

मानव का प्रतिरक्षा तंत्र बहुत बेजोड़ है। इसमें मुख्य रूप से लसीकाभ अंग (Lymphoid Organs) शामिल होते हैं, जहाँ लसीकाणुओं (Lymphocytes) का जन्म और विकास होता है। इन्हें दो भागों में बाँटा गया है:

1. प्राथमिक लसीकाभ अंग (Primary Lymphoid Organs) [BSEB 2026]

यहाँ लसीकाणु पैदा होते हैं और रोगाणुओं से लड़ने के लिए तैयार होते हैं। इसके दो मुख्य अंग हैं:

अस्थि मज्जा (Bone Marrow): यह मुख्य अंग है जहाँ B और T लसीकाणुओं सहित खून की सभी कोशिकाएं बनती हैं।

थाइमस (Thymus): यह हृदय के पास स्थित एक अंग है। यह जन्म के समय काफी बड़ा होता है, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ यह छोटा होता जाता है। यह T-लसीकाणुओं को परिपक्व (Mature) होने की जगह देता है।

2. द्वितीयक लसीकाभ अंग (Secondary Lymphoid Organs)

परिपक्व होने के बाद लसीकाणु यहाँ आ जाते हैं और यहीं वे असली रोगाणुओं (Antigen) से लड़ते हैं। इसके मुख्य अंग हैं:

प्लीहा (Spleen): यह सेम के बीज के आकार का होता है। यह खून को छानने (Blood filter) का काम करता है और इसमें लाल रक्त कोशिकाओं (RBCs) का बड़ा भंडार होता है।

लसीका ग्रंथियाँ (Lymph Nodes): ये लसीका तरल में मौजूद कीटाणुओं को फँसाकर लसीकाणुओं को सक्रिय (Active) करती हैं।

MALT (श्लेष्म संबद्ध लसीकाभ ऊतक): यह श्वसन, पाचन और जननमूत्र नली की अंदरूनी परत में पाया जाता है। यह मानव शरीर के कुल लसीकाभ ऊतक का लगभग 50 प्रतिशत (50%) हिस्सा बनाता है।